कैंची धाम मंदिर के स्थापना के पीछे रोचक कथा

उत्तराखंड
ब्यूरो रिपोर्ट मुकेश गुप News AVP
कैंची धाम मंदिर के स्थापना के पीछे रोचक कथा
शिप्रा नदी पर स्थित मंदिर के स्थापना के पीछे रोचक कथा है। महाराज के मन में उठी मौज ही उनका संकल्प बन जाती थी। ऐसी ही मौज में बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। बुजुर्ग बताते हैं कि वर्ष 1942 में कैची निवासी पूर्णानंद तिवारी सवारी के अभाव में नैनीताल से गेठिया होते हुए पैदल ही कैंची की ओर लौट रहे थे। तभी एक स्थूलकाय व्यक्ति कंबल लपेटे हुए नजर आया तो तिवारी जी डर गए। उस व्यक्ति ने तिवारी जी को उनका नाम लेकर पुकारा और इस समय उनके वहां पहुंचने का कारण भी बता दिया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं बाबा नीब करौरी महाराज थे। बाबा ने तिवारी से निडर होकर आगे जाने को कहा। तब तिवारी ने बाबा से पूछा कि अब कब उनके दर्शन होंगे तब बाबा ने कहा था 20 साल बाद। यह कहकर बाबा ओझल हो गए।
20 साल बाद पुरानी यादे की ताजा
ठीक 20 साल बाद बाबा नीब करौरी महाराज तुलाराम साह और श्री सिद्धि मां के साथ रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे। तभी बाबा कैंची में उतर गए और कुछ देर तक पैराफिट में बैठे रहे। उन्होंने पुरानी यादें ताजा की और यह स्थान देखने की इच्छा जताई। जहां साधु प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज ने 24 मई 1962 को बाबा के पावन चरण इस भूमि में रखे। यहां वर्तमान में कैंची मंदिर स्थित है। तब बाबा ने कैंची धाम में उस समय घास और जंगल के बीच घिरे चबूतरे और हवन कुंड को ढकने को कहा। ये वहीं स्थान धाम है जहां सोमवारी महाराज ने वास किया था। वर्तमान में इसमें भगवान हनुमान का मंदिर है। इसी में सोमवारी महाराज की धूणी के अवशेष आज भी सुरक्षित है। कैंची धाम से जुड़े एमपी सिंह ने बताया कि 15 जून 1964 को मंदिर में हनुमान की मूर्ति की प्रतिष्ठा की गई तभी से 15 जून को प्रतिष्ठा दिवस के रूप मे मनाया जाता है।